अध्‍याय -1

खाद्य एवं रसद विभाग के कार्यकलापों का मुख्य दायित्व प्रमुख सचिव/सचिव, खाद्य तथा रसद विभाग में निहित है जिसके अधीन मुख्यालय के माध्यम से आपूर्ति शाखा, विपणन शाखा, लेखा व खाद्य प्रकोष्ठ के कार्य कलापों का नियत्रंण एवं संचालन किया जाता है। विपणन शाखा का मुख्य दायित्व कृषकों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने के उद्वेश्य से मूल्य समर्थन योजना के अन्तर्गत खाद्यान्न का क्रय तथा केन्द्रीय पूल तथा स्टेट पूल के लिए गेंहूँ व चावल की खरीद, खाद्यान्न व चीनी क्रमशः भारतीय खाद्य निगम तथा स्टेट पूल व पी0सी0एफ0 से प्राप्त कर राशन दुकानदारों को उपलब्ध कराना, दालों, तिलहनों, खाद्य तेलों व चीनी आदि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखने तथा उनकी जमाखोरी/काला बाजारी रोकने के उद्वेश्य से विभिन्न नियंत्रण आदेशों के अन्तर्गत प्रवर्तन कार्य करना है। इस हेतु खाद्य आयुक्त के अधीन मुख्यालय पर मुख्य विपणन अधिकारी, मण्डल स्तर पर संभागीय खाद्य नियंत्रक व संभागीय खाद्य विपणन अधिकारी, जिला स्तर पर जिला खाद्य विपणन अधिकारी व उनके अधीन वरिष्ठ विपनणन निरीक्षक एवं विपणन निरीक्षक मुख्य रूप से उत्तरदायी है। आपूर्ति शाखा का मुख्य दायित्व सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से प्रदेश की जनता को खाद्यान्न एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं को उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ खाद्यान्न एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखना, उचित उपलब्धता बनाये रखना व जमाखोरी एवं काला बाजारी रोकने के उद्वेश्य से आवश्यक वस्तु अधिनियम व उसके अन्तर्गत बने विभिन्न नियंत्रण आदेशों के अन्तर्गत कार्य करना है। इस हेतु खाद्य आयुक्त के अधीन  मुख्यालय स्तर पर उपायुक्त, खाद्य अधिकारी, वरिष्ठ पूर्ति निरीक्षक, पूर्ति निरीक्षक कार्यरत है। लेखा शाखा का मुख्य कार्य विभाग के वित्तीय मामलों तथा व्यय आदि के लेखा विवरण का नियमानुसार रख-रखाव सुनिश्चित करनाना, व्ययों पर प्रभावी नियंत्रण रखना तथा लेखा अभिलेखों/ब्यय विवरणों का समय-समय पर सम्परीक्षा करते रहना है। इसके लिए मुख्यालय स्तर पर वित्त सम्प्रेक्षक तैनात है। खाद्य प्रकोष्ठ मुख्य रूप से विभाग के विभिन्न नियंत्रण आदेशों के प्रवर्तन हेतु कोआर्डिनेशन तथा सम्गलिंग रोकने के लिए पुलिस से सम्पर्क स्थापित करके छापों को आयोजित करने का कार्य तथा विभागीय अधिकारियों/कर्मचारियों के विरूद्व प्राप्त भ्रष्टाचार/अनियमितताओं आदि की शिकायत की जांच करता है तथा दोषी पाये जाने पर यथोचित विधिक/विभागीय कार्यवाही के लिए संस्तुति करता है। इस हेतु मुख्यालय स्तर पर खाद्य आयुक्त के अधीन उप पुलिस महानिरीक्षक, सह अपर आयुक्त, पुलिस अधीक्षक एवं पुलिस उप अधीक्षक तैनात है।

    मानक बांट तथा माप (प्रवर्तन) अधिनियम 1959 एवं उसके अन्तर्गत बनी नियमावली 1960 के प्रावधानों के अनुसार मैट्रिक प्रणाली का प्रदेश प्रचार-प्रसार एवं प्रवर्तन का कार्य सम्पादित करने हेतु नियंत्रक, बांट तथा माप के अधीन प्रदेश में बांट तथा माप विभाग की स्थापना की गई है। इसका मुख्य उद्वेश्य व्यापारिक लेन-देन में प्रयुक्त होने वाले बांटो तथा मापों, तौलने मापने के यत्रांदि की परिशुद्वता की जांच करना एवं घटतौली करने वाले व्यापारियों के विरूद्व मानक बांट माप प्रवर्तन अधिनियम 1985 के प्रावधानों के अंतर्गत कार्यवाही सुनिश्चित करना है। इसके अतिरिक्त पैकेज्ड कमोडिटीज रूल्स 1977 के प्रावधानों का क्रियान्वयन भी विभाग द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। विभाग की राजस्व प्राप्ति के मुख्य श्रोत बांट माप के सत्यापन/मुद्राकंन से प्राप्त होने वाला शुल्क, समझौता शुल्क, लाइसेन्स से प्राप्त शुल्क है। इस हेतु मुख्यालय पर नियंत्रक,विधिक माप विज्ञान के अधीन मण्डल स्तर पर उप नियंत्रक, सहायक नियंत्रक व जिला स्तर पर वरिष्ठ निरीक्षक एवं निरीक्षक स्तर पर कार्य मानक प्रयोगशालायें स्थापित है जिनके माध्यम से उपरोक्त दायित्वों का निर्वहन होता है।

    उपभोक्ता संबंधी मामलों में कम लागत में शीघ्र न्याय उपलब्ध कराये जाने के उद्वेश्य से जनपद स्तर पर जिला उपभोक्ता फोरम, (जिला मंच) प्रदेश स्तर पर राज्य आयोग एवं राष्ट्र स्तर पर राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की गई है। न्यायिक मामलों में जिला फोरम (जिला मंच) के ऊपर राज्य आयोग तथा राज्य आयोग के ऊपर राष्ट्रीय आयोग का नियत्रंण होता है। उपभोक्ता संरक्षण कार्यक्रम के अन्तर्गत त्रि-स्तरीय अर्ध-न्यायिक तंत्र की स्थापना की गई है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में संसद द्वारा वर्ष 2002 में पारित संशोधन, जो 15.3.2003 से प्रभावी हो गया है, के तहत जिला मंचों, राज्य आयोग तथा राष्ट्रीय आयोग की धन संबंधी अधिकारिता की सीमा को बढ़ा दिया गया है। राज्य आयोग एवं जिला मंचों का विभागाध्यक्ष अब अध्यक्ष राज्य आयोग को घोषित कर दिया गया है तथा राज्य आयोग का सीधा नियंत्रण जनपद मंचों पर स्थापित किया गया है ताकि उनके कार्यों को अधिक गतिशील बनाया जा सके। प्रत्येक जिले के लिए जिला उपभोक्ता परिषद का गठन भी किया जा चुका है।

    प्रदेश में कार्यरत ईट भट्ठों के प्रयोग हेतु जिलाधिकारियों की संस्तुति पर स्लैक कोल की स्पांसरिंग का मुख्य दायित्व संचरण निदेशालय का है। इसके अन्तर्गत संचरण निदेशक, मूवमेन्ट इन्सपेक्टर, ट्रैफिक इन्सपेक्टर व वरिष्ठ सहायक कार्यरत है।

    कम्पनी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1956 के अधीन वर्ष 1947 में उत्तर प्रदेश राज्य खाद्य एवं आवश्यक वस्तु निगम की स्थापना की गई थी। निगम का मुख्य उद्वेश्य खाद्य एवं रसद विभाग की योजनाओं के सफल क्रियान्वयन हेतु उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तुओं को उचित मूल्यों पर उपलब्ध कराना, खाद्यान्नों, तेलों, बीजों तथा अन्य कृषि उत्पादों की खरीद, भण्डारण, वितरण तथा विक्रय करना एवं रबी क्रय योजना के माध्यम से किसानों को मूल्य समर्थन योजना के अन्तर्गत उचित मूल्य दिलाने के साथ ही भारत सरकार तथा प्रदेश सरकार द्वारा सौपें गये अन्य कार्यों को सम्पन्न कराना है। इस हेतु निगम में प्रबन्ध निदेशक, सामान्य प्रबन्धक, वित्त नियंत्रक एवं वित्त लेखाधिकारी सहित अन्य कर्मचारी कार्यरत है।

    सोसायटी रजिस्टे्रशन एक्ट 1860 के अधीन वर्ष 1965 में उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी कल्याण निगम की स्थापना की गई है। इसका मुख्य दायित्व प्रदेश के कर्मचारियों को दैनिक उपयोग की आवश्यक वस्तुयें बाजार दर की अपेक्षा सस्ती दरों पर उपलब्घ कराना तथा कार्यालय प्रांगण में ही जलपानगृह स्थापित कर सस्ता एवं स्वच्छ जलपान उपलब्ध कराना है। इस हेतु निगम में मुख्यालय पर अधिशासी निदेशक, संयुक्त निदेशक, उप निदेशक, वित्त एवं लेखाधिकारी सहित डिपोज स्तर पर प्रबन्धक व अन्य तथा जलपान गृह स्तर पर प्रबन्धक व अन्य कार्यरत है। निगम वर्तमान में प्रदेश में 158 डिपो व 27 जलपानगृहों के माध्यम से अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है।