2. आहरण वितरण अधिकारी की भूमिका एवं सामान्य लेखा नियम

1.    आहरण वितरण अधिकार का प्राविधान

                       शासनादेश संख्या-ए-2-1701/दस-14(4)-1973, दिनांक 28 जुलाई, 1973 द्वारा शासन के प्रशासनिक विभागों को अपने अधीनस्थ कार्यालयों के लिये कार्यालयाध्यक्ष अथवा किसी अन्य राजपत्रित अधिकारी को आहरण एवं वितरण अधिकारी घोषित करने हेतु प्राधिकृत किया गया था। राज्य के आय-व्यय प्रबन्धन एवं वित्तीय  अनुशासन को अधिक प्रभावी बनाये जाने के उद्देश्य से वित्त विभाग के कार्यालय ज्ञाप संख्या बी-13361/दस-1998, दिनांक 4 अगस्त, 1998 द्वारा प्रशासनिक विभागों को प्रतिनिधानित उपर्युक्त अधिकार को निरस्त करते हुए यह व्यवस्था की गयी कि आहरण एवं वितरण अधिकारी घोषित करने हेतु वित्त विभाग की सहमति आवश्यक होगी। यह व्यवस्था दिनांक 01 अक्टूबर, 1998 से प्रभावी की गयी। इस व्यवस्था के अधीन अब सामान्यता एक जनपद में एक विभाग का एक ही आहरण एवं वितरण अधिकारी रखा जाता है। शासन द्वारा घोषित कोई भी आहरण वितरण अधिकारी/कार्यालयाध्यक्ष वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर 47-जी फुटनोट- 1 के द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपने अधीन किसी भी एक राजपत्रित अधिकारी को आहरण वितरण अधिकारी के रूप में विपत्रों/चेकों पर हस्ताक्षर करने हेतु अधिकृत कर सकता है। किसी व्यय को प्राधिकृत अथवा स्वीकृत करने विषयक कार्यालयाध्यक्ष के वित्तीय अधिकारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

2.    आहरण-वितरण अधिकारी एवं डी0डी0ओ0 कोड

                    प्रशासनिक विभाग की संस्तुति पर वित्त विभाग द्वारा किसी अधिकारी को आहरण-वितरण अधिकारी घोषित करने के साथ ही साथ उसे आहरण-वितरण अधिकारी की विशिष्ट कोड संख्या (डी0डी0ओ0 कोड) भी आबंटित की जाती है। दिनांक 4 अगस्त, 1998 के उक्त निर्देश को अधिक प्रभावी बनाने हेतु शासनादेश संख्या बी-1-1704/दस-1999, दिनांक 21 अप्रैल, 1999 द्वारा किसी आहरण-वितरण अधिकारी की प्रोन्नति, स्थानान्तरण, अथवा अन्य स्थितियों में व्यवस्था सुनिश्चित करने विषयक निम्नवत् प्राविधान किए गए हैं :-

        क-    आहरण-वितरण अधिकारी के स्थानान्तरण के उपरान्त पद धारक के समकक्ष वेतनमान के स्तर के अधिकारी (यदि आहरण-वितरण हेतु किसी अन्य प्रकरण में प्रतिबन्ध न लगाया गया हो) की तैनाती होने की दशा में पूर्व में आबंटित डी0डी0ओ0 कोड से ही आहरण-वितरण का कार्य किया जा सकता है।

        ख-    आहरण-वितरण का कार्य करने वाले अधिकारी की अनुपलब्धता (स्थानान्तरण अथवा अन्य कारण) के फलस्वरूप आबंटित डी0डी0ओ0 कोड के पद  से उच्च वेतनमान के स्तर का अधिकारी नियुक्त हो तो आबंटित डी0डी0ओ0 कोड से ही आहरण-वितरण कार्य किया जा सकता है, शर्त यह होगी कि ऐसे उच्च स्तर के अधिकारी को आहरण-वितरण कार्य करने हेतु किसी अन्य मामले में प्रतिबन्धित न किया गया हो।

        ग-    आहरण-वितरण का कार्य करने वाले अधिकारी के स्थानान्तरण अथवा अन्य प्रकार से रिक्त होने पर आबंटित डी0डी0ओ0 कोड के पद से निम्न वेतनमान के स्तर के अधिकारी की तैनाती होने पर यह देखा जाना होगा कि सम्बन्धित अधिकारी आहरण-वितरण हेतु उपयुक्त है अथवा नहीं? यदि ऐसे अधिकारी समूह "ख"  के वेतनमान में कम से कम 5 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके हो तो आबंटित डी0डी0ओ0 कोड से उनके द्वारा आहरण-वितरण का कार्य किया जा सकता है।

        घ-    यदि किसी विभाग में आहरण-वितरण का कार्य करने वाले अधिकारी के स्थानान्तरण अथवा अन्य कारणों से पद रिक्त हो जाता है तथा आहरण-वितरण का कार्य अवरूद्ध हो जाता है तो आबंटित डी0डी0ओ0 कोड से ही जिलाधिकारी द्वारा नामित अधिकारी आहरण-वितरण का कार्य उक्त अवधि के लिये कर सकते है।

        च-    आहरण-वितरण का कार्य करने वाले अधिकारी यदि कार्यालयाध्यक्ष अथवा विभागाध्यक्ष स्तर के अधिकारी हो तो उनके स्वयं के उत्तरदायित्व पर नियमानुसार आहरण-वितरण का कार्य उनके अधीनस्थ किसी उपयुक्त अधिकारी को प्रतिनिधायित किया जा सकता है।

        छ-    प्रशासनिक विभाग द्वारा आबंटित किये गये डी0डी0ओ0 कोड की संख्या में किसी प्रकार का परिवर्तन अथवा वृद्धि नहीं की जायेगी।

         ज-    यदि आबंटित किये गये किसी डी0डी0ओ0 कोड की पूरे वर्ष के दौरान चालू रखे जाने की आवश्यकता न हो तो इसकी सूचना भी विभागाध्यक्ष स्तर से वित्त विभाग के बजट अनुभाग-1 को उपलब्ध करायी जानी होगी, जिससे इसे निरस्त किया जा सके।

           झ-    वित्त विभाग में डी0डी0ओ0 कोड आबंटित किये जाने की व्यवस्था को कम्प्यूटरीकृत किया जा चुका है।

                    प्रशासकीय विभाग द्वारा उपर्युक्त प्रक्रिया का अनिवार्य रूप से अनुसरण किया जाना चाहिए जिससे आवश्यक सूचना बजट अनुभाग-1 को उपलब्ध रहे तथा डी0डी0ओ0 कोड की अद्यावधिक स्थिति की जानकारी वित्त विभाग के पास सदैव उपलब्ध होती रहे।

3.    आरहण-वितरण अधिकारी के दायित्व/प्रकार्य

                    आहरण-वितरण अधिकारी के कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों का निर्धारण कोषागार नियम और उसके अधीन बनाई गयी विभिन्न वित्तीय नियमावलियों द्वारा किया गया है। उक्त नियमावलियों के साथ-साथ प्रशासनिक विभाग, वित्त विभाग तथा विभागाध्यक्षों के स्तर के समय-समय पर दिये गये निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करना भी आहरण-वितरण अधिकारी का उत्तरदायित्व होता है। यद्यपि आहरण-वितरण अधिकारी पदनाम से ऐसा आभास होता है कि उक्त अधिकारी के कर्तव्य केवल शासकीय धनराशि के आहरण एवं वितरण‍ तक सीमित है, परन्तु वास्तव में आहरण-वितरण अधिकारी किसी कार्यालय विशेष के समस्त शासकीय लेन-देन अथवा वित्तीय व्यवहारों के सम्यक् संचालनार्थ उत्तरदायी होते हैं।

                    वित्त विभाग के महत्वपूर्ण शासनादेशों में से शासनादेश संख्या ए-1-1330/दस-4(1)-70, दिनांक 17 मई, 1979 विशेष रूप से अवलोकनीय है, जिसमें लेखा कार्य सम्बन्धी कर्तव्यों एवं दायित्वों के निष्पादन में आहरण-वितरण अधिकारियों द्वारा ध्यान देने योग्य मुख्य बातों का उल्लेख किया गया है। साथ ही साथ समय-समय पर किये गये संशोधन को भी ध्यान में रखना बहुत आवश्यक है।

(क)   आय/प्राप्तियों संबंधी प्रकार्य-

  1.  विभागीय आय व अन्य सरकारी धन जो भुगतान कर्ताओं द्वारा कार्यालयों में जमा किये जाते हैं, को प्राप्त करने के लिए कार्यालय में 'काउन्टर' की व्यवस्था उचित स्थान पर करें।

  2. धन प्राप्त करने हेतु किसी कर्मचारी की जिम्मेदारी निर्धारित कर दें। जिन कार्यालयों में कैशियर नियुक्त है वहाँ सरकारी धन का लेन-देन उन्ही को सुपुर्द किया जाना चाहिए।

  3. धन जमा करने के उपरान्त रसीद की व्यवस्था की जानी चाहिए। सरकारी धन की प्राप्ति के लिए दी जाने वाली रसीद ट्रेजरी फार्म 385 अथवा अन्य निर्धारित विभागीय प्रपत्र में रसीद देने की व्यवस्था नियमों के अंतर्गत निर्धारित है। यह प्रपत्र 385 कोषागारों से प्राप्त किये जा सकते हैं। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि रसीद निर्धारित प्रपत्र में ही दी जा रही है।

  4. रसीद को लिखने के लिए दो तरफा कार्बन पेपर प्रयोग किया जाना चाहिए तथा अन्य वांछित अंकन के अतिरिक्त उसमें प्राप्त धनराशि को अंकों और शब्दों दोनों में ही लिखा जाना चाहिए। रसीद में कैशियर व कार्यालयाध्यक्ष अथवा उनके द्वारा नामित अधिकारी के हस्ताक्षर किये जाने चाहिए।

  5. यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि प्रत्येक रसीद की धनराशि की प्रविष्टि रोकड़ बही में आय पक्ष की ओर कर ली गयी है।

  6. प्राप्त आय को बिना अनुचित विलम्ब किये फार्म 43-ए में चालान भर कर कोषागार/स्टेट बैंक में निर्धारित लेखा शीर्षक के अन्तर्गत जमा कर दिया जाना चाहिए।

  7. जब विभागीय प्राप्तियाँ एक माह में रू0 1000/- से अधिक जमा की गई हो तो उनका सत्यापन कोषागार से भी करना चाहिए जिससे यह सुनिश्चित हो जाय कि धनराशि सही लेखा शीर्षक में और सरकारी खजाने में जमा हो गई है।

(ख) व्यय/भुगतान संबंधी कार्य

  1. कोषागार द्वारा पारित बिल/चेक वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-एक के प्रस्तर 47-ए में निर्धारित रजिस्टर पर चढ़ा करके ही सम्बन्धित सेवक तथा कैशियर को आहरित करने के लिए दिये जायें और यदि सुरक्षा की दृष्टिकोण से कई व्यक्ति कैशियर के साथ भेजे जाते हैं तो उन सभी के हस्ताक्षर इस रजिस्टर पर होना चाहिए।

  2. कोषागार/स्टेट बैंक से कार्यालय तक आहरित धनराशि लाने के लिए अथवा कार्यालय से धन जमा करने के लिए ले जाते समय उसकी सुरक्षित अभिरक्षा की व्यवस्था कर लेना भी आहरण-वितरण अधिकारी का दायित्व है। धन को लाने व भिजवाने का कार्य यथासम्भव कैशियर को ही सौंपा जाना चाहिए। जिन कार्यालयों में कैशियर नियुक्त न हों वहाँ पर यह कार्य आहरण-वितरण अधिकारी को स्वयं अथवा वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के परिशिष्ट-17 में उल्लिखित उत्तरदायी सरकारी सेवक द्वारा कराया जाना चाहिए। प्राप्त धनराशि जमा करने तथा आहरित धनराशि के भुगतान के पूर्व जब धनराशि कार्यालय में रहती है तो उसकी सुरक्षित अभिरक्षा की जानी चाहिए। उस अवधि में सरकारी धनराशि मजबूत कैशचेस्ट जिसमें अलग-अलग प्रकार के दो ताले लगाने की व्यवस्था हो, बन्द करके रखना चाहिए। दैनिक अवशेष की जाँच संवितरण अधिकारी द्वारा व मासिक अवशेष का सत्यापन कार्यालयाध्यक्ष द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नियमित रूप से करना चाहिए। कैशचेस्ट के चाभियों के सेट में से एक ताले की कुंजी कैशियर या सरकारी धन का लेन-देन कार्य करने वाले कर्मचारी के पास रहनी चाहिए तथा दूसरी चाभी संवितरण अधिकारी के पास रहना चाहिए। चाभियों का दूसरा सेट कोषागार में जमा कर देना चाहिए।

  3. माह के अन्त में अवशेष का भौतिक सत्यापन करते समय यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि आहरित धनराशि बहुत दिनों से अवितरित क्यों पड़ी है और यदि उस समय उसकी आवश्यकता न हो तो शार्ट ड्राल करके उसे समायोजित कर लेना चाहिए।

  4. कैशचेस्ट के तालों की दोहरी कुंजियों को सुरक्षित स्थान पर रखा जाना चाहिए। वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-82 के नीचे अंकित टिप्पणी (1) के अनुसार यदि उपयुक्त समझा जाता हो, तो इन दोहरी कुंजियों को एक पैकेट में सील बन्द करके कोषागार के द्वितालक में सुरक्षित अभिरक्षा हेतु मूल्यवान वस्तु के रूप में रखा जा सकता है। ऐसा किये जाने पर कार्यालयाध्यक्ष को प्रत्येक वर्ष के अप्रैल माह में पैकेट वापस लेकर उसकी जाँच करनी आवश्यक होती है। जाँच करने के पश्चात दोहरी कुंजियों को पैकेट में सील बन्द कर पुन: सुरक्षित अभिरक्षा हेतु कोषागार में जमा किया जा सकता है। दोहरी कुंजियों के सत्यापन किये जाने के तथ्य की निर्धारित पंजी में आवश्यक प्रविष्टि कर ली जानी चाहिए।

  5. शासकीय धन के व्यय से सम्बन्धित वित्तीय औचित्य  के सिद्धान्तों का उल्लेख उत्तर प्रदेश बजट मैनुअल के प्रस्तर-12 में किया गया है। उक्त नियम के अनुसार -

         क-    सरकारी धन को व्यय करने में वैसी ही सतर्कता बरतनी चाहिए जैसी कि एक साधारण मनुष्य स्वयं अपने धन को खर्च करने में बरतता है। इसका तात्पर्य मितव्ययिता बरतने व अपव्यय से बचने का है। यह सर्वविदित है कि एक मितव्ययी व्यक्ति आवश्यकता के अनुरूप तथा अपने साधनों के अन्तर्गत ही व्यय करता है। व्यय करने में न तो वह कंजूसी बरतता है और न ही फिजूलखर्ची।

          ख-    व्यय आवंटित धन की सीमा के अन्तर्गत रहते हुए किया जाना चाहिए।

         ग-    किसी मद में स्वीकृति से अधिक व्यय अनिवार्य रूप से आवश्यक होने की सम्भावना होने पर यथा समय पूर्व अतिरिक्त आवंटन प्राप्त करने की कार्यवाही की जानी चाहिए।

          घ-    कोषागार से धन तभी आहरित किया जाना चाहिए जब उसके तुरन्त भुगतान की आवश्यकता हो अथवा आहरण कार्यालय के लिए स्वीकृत अग्रदाय से किये गये व्यय की प्रतिपूर्ति हेतु आवश्यक हो। धन उतना ही आहरित किया जाना चाहिए जिसके तुरन्त व्यय की आवश्यकता हो।

           ड-    संवितरण अधिकारी को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि आहरित धनराशि को यथा समय तुरन्त सही दावेदार को भुगतान कर उससे नियमानुसार रसीद प्राप्त करके उसे सुरक्षित रखने तथा प्रत्येक लेन-देन को नियमानुसार लेखाबद्ध करना उसका दायित्व होता है।

  1. शासनादेश संख्या ए-1-1429/दस-93-10(11)-93, दिनांक 20-9-93 के अनुसार निजी व्यक्तियों, संस्थाओं तथा पार्टीज को रूपया 2,000 से अधिक के भुगतान नकद नहीं किए जाने चाहिए। इस आदेश के तहत मुख्यालय से बाहर के भुगतानों के भारतीय स्टेट बैंक से डिमाण्ड ड्राफ्ट ऐट पार मिल जाते हैं। परन्तु स्थानीय भुगतानों के सम्बन्ध में सामान्यत: डिमाण्ड ड्राफ्ट या बैंक ड्राफ्ट ने देकर बैंकर्स चेक जारी कर देते हैं और कमीशन चार्ज कर लेते हैं। शासन ने बैंकों द्वारा इस प्रकार कमीशन चार्ज किये जाने को उचित नहीं पाया है। अत: शासनादेश संख्या ए-1-1450/दस-96-10(11)-93, दिनांक 23-7-1996 द्वारा यह अपेक्षा की गयी है कि उपर्युक्त प्रकार के स्थानीय भुगतानों के सम्बन्ध में जहाँ बैंक ड्राफ्ट या डिमान्ड ड्राफ्ट नहीं उपलब्ध होते हों वहाँ इस प्रकार के भुगतान को एकाउन्ट पेयी चेक के माध्यम से किया जायेगा। शासन किसी भी दशा में राजकीय भुगतान के लिए बैंकर्स चेक लिये जाने पर कमीशन का भुगतान नहीं करेगा।

  2. शासनादेश संख्या ए-1-1450/दस-96-10(11)-93, दिनांक 29-6-2005  के अनुसार राजकीय सेवकों को सामान्य परिस्थितियों में कोई भी भुगतान बैंक के माध्यम से ही किया जाएगा। विशेष परिस्थितियों में रू0 पाँच हजार तक का भुगतान आहरण-वितरण अधिकारियों द्वारा अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर किसी सेवक को नकद किया जा सकता है।

4.    आहरण एवं वितरण अधिकारियों द्वारा ध्यान देने योग्य कुछ अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु

5.    देयकों का कोषागार में प्रस्तुतिकरण

                  विभाग द्वारा किये जाने वाले भुगतान के सम्बन्ध में आहरण एवं वितरण अधिकारी को नियमानुसार निर्धारित प्रपत्र पर बिल बनाकर कोषागार में प्रस्तुत कर धन का आहरण करके यथासम्भव व तुरन्त सही दावेदार को उसका वास्ततिक भुगतान की आवश्यकता हो।

         (क)  निर्धारित कोषागार देयक प्रपत्र - शासनादेश संख्या ए-1-78/दस-92-10(1)-14-85, दिनांक 20 जनवरी, 1992 द्वारा 1 अप्रैल, 1992 से प्रदेश में पूर्व में प्रचलित लगभग 35 देयक प्रपत्रों के स्थान पर कोषागारों से धन आहरित करने हेतु केवल 6 देयक प्रपत्र निर्धारित किये गये हैं जो निम्नवत् हैं -

                   1-    प्रपत्र रिकार्ड कोड 101            वेतन देयक प्रपत्र    

                   2-    प्रपत्र रिकार्ड कोड 102            यात्रा देयक प्रपत्र

                   3-    प्रपत्र रिकार्ड कोड 103            आकस्मिक देयक प्रपत्र

                    4-    प्रपत्र रिकार्ड कोड 104            निक्षेप वापसी एवं क्षतिपूर्ति देयक प्रपत्र

                    5-    प्रपत्र रिकार्ड कोड 105            सामान्य देयक प्रपत्र (सहायता अनुदान, ऋण एवं अग्रिम )

                    6-    प्रपत्र रिकार्ड कोड 106           सेवानैवृत्तिक लाभ देयक प्रपत्र  

        (ख)-    प्रपत्र भरने संबंधी दिशानिर्देश -     उपर्युक्त शासनादेश दिनांक 20 जनवरी, 1992 में प्रपत्रों के भरने के सम्बन्ध में विस्तृत निर्देश भी दिये गये हैं। बिल तैयारी विषयक सामान्य नियम वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-47 तथा समय-समय पर निर्गत शासनादेशों में दिये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं -

  1. प्रत्येक बिल निर्धारित प्रपत्र पर नियमानुसार शुद्धता से तैयार किया जाना चाहिए,

  2. बिल में अंकों को लिखने में सदैव अंग्रेजी अंकों का प्रयोग किया जाना चाहिए,

  3. बिल में अंकित धनराशि में 'ओवरराइटिंग' आपत्तिजनक है। गलती होने पर प्रविष्टि को आर-पार रेखा खींच कर काट देना चाहिए तथा उसकी सही प्रविष्टि कर काट-पीट को पूर्ण हस्ताक्षरों द्वारा तारीख डालकर सत्यापित कर दिया जाना चाहिए।

  4. बिल में प्रविष्टियों को खुरचना (इरेक्टिंग) द्वारा लिखना निषेध है। कोषागार द्वारा ऐसे बिल स्वीकार नहीं किये जाते हैं।

  5. बिल में शुद्ध देय धनराशि को अंकों व शब्दों में इस प्रकार से लिखा जाना चाहिए कि उनके बीच में धनराशि को बढ़ाने के लिए सम्भावना न छूटने पाये। इस कारण धोखाधड़ी होने की स्थिति में आहरण एवं वितरण अधिकारी ही व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होते हैं।

  6. प्रत्येक व्यक्ति/फर्म आदि को देय सकल धनराशि को पूर्णांकित किया जाना चाहिए। बिलों को लिखने में स्याही का प्रयोग किया जाना चाहिए या उन्हें टाइप कराना चाहिए।

  7. बिलों में हस्ताक्षर निश्चित स्थान पर ही करना चाहिए। अनावश्यक हस्ताक्षर नहीं किये जाने चाहिए।

  8. लेखाशीर्षक के तेरह अंको का कोड, डी0डी0ओ0 कोड, सोर्स कोड, सेक्टर कोड, अनुदान संख्या, यथास्थान भरा जाना चाहिए।

  9. देयक प्रपत्रों पर देयक पंजी क्रम संख्या का कालम सावधानी पूर्वक 11 सी रजिस्टर के क्रमांक से सही-सही भरा जाना चाहिए क्योंकि वही क्रम संख्या बाद में बी0एम0 9ए से मिलान में सहायक सिद्ध होता है।

  10. शासनादेश संख्या बी-1-3743(1)/दस-16/94 दिनांक 15 अक्टूबर, 1994 के अनुसार प्रत्येक देयक पर आहरण-वितरण अधिकारियों द्वारा निम्नवत् प्रमाणपत्र दिया जाना अनिवार्य है -

                            बिल पर अंकित बजट आबंटन की राशि तथा उसके समक्ष कुल
                            व्यय की राशि की मैंने स्वयं जाँच कर ली है और वही सही है।

                                                                                                           आहरण-वितरण अधिकारी के हस्ताक्षर

                                                                                                                                      मुहर

(ग)  अधिष्ठान वेतन बिल -

  1. स्थाई और अस्थाई अधिष्ठान के सभी समूहों के वेतन के लिए एक ही वेतन बिल प्रपत्र कोड-101 (संशोधित) में तैयार किया जाना चाहिए। विभिन्न लेखा शीर्षकों के अन्तर्गत आहरित होने वाले वेतन व भत्तों से सम्बन्धित वेतन बिल इसी प्रपत्र पर पृथक-प्रथक बनाये जायेंगे।

  2. अधिष्ठान जिनके सम्बन्ध में सेवा पुस्तिकायें रखना आवश्यक नहीं होता है, के कर्मचारियों के वेतन बिल पृथक बनाये जाने चाहिए। वेतन बिल में स्थाई अधिष्ठान के अन्तर्गत नियुक्त स्थायी एवं अस्थायी समस्त कर्मचारियों के नाम व पदनाम उनके वेतन समूह के क्रम के अनुसार अंकित करके प्रत्येक कर्मचारी के वेतन व भत्तों की धनराशि अंकित की जानी चाहिए। यदि कोई पद भरा नहीं है तो उसके सम्मुख 'पद रिक्त' भर देना चाहिए -    

  3. प्रारम्भ में पदों की स्वीकृति/निरन्तरता विषयक आदेश/आदेशों की संख्या व तिथि लाल स्याही से अंकित की जानी चाहिए। जब अस्थायी अधिष्ठान के पदों की निरन्तरता के लिए आवेदन किया गया हो परन्तु स्वीकृति प्राप्‍त न हुई हो तो आहरण वितरण अधिकारी को स्वीकृति की प्रत्याशा से प्रथम तीन माहों अर्थात मार्च, अप्रैल  व मई तक वेतन आहरित करते रहना चाहिए कि पदों की निरन्तरता के लिए आवेदन किया गया है परन्तु स्वीकृति प्राप्त नही हुई है। माह जून के वेतन (जिसका भुगतान जुलाई मे देय होता है) तथा उसके बाद के माहों के वेतन का आहरण स्वीकृत प्राप्त होने तक नहीं किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में शासन द्वारा निर्धारित चेकिंग फार्मूले के अनुसार निम्न बिन्दुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए-

  1. प्रस्तर-98 के नीचे अंकित टिप्पणी के अनुसार वेतन भत्तों का आहरण उस जिले में ही उत्पन्न व देय होता है जहाँ सम्बन्धित सरकारी सेवक के आहरण व वितरण अधिकारी व कार्यालय स्थित हो। स्थानान्तरण की दशा में वेतन व भत्तों का आहरण प्रस्तर-141(2) में उल्लिखित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है।

  2. जब किसी वेतन बिल में किसी कर्मचारी के सम्बन्ध में वार्षिक वेतन वृद्धि प्रथम बार आहरित की जा रही हो तो प्रस्तर-137 द्वारा वांछित वार्षिक वेतन वृद्धि प्रमाण-पत्र बिल के साथ संलग्न किया जाना चाहिए।

  3. अवकाश वेतन बिल में हस्ताक्षर करते समय यह सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि अवकाश की अवधि को अवकाश के लेखे में घटा दिया गया है तथा उसकी प्रविष्टि सेवा पुस्तिका/सेवा रोल में कर दी गई है।

  4. कालातीत देयकों को पूर्व लेखापरीक्षा के पश्चात ही कोषागार में आहरण हेतु प्रेषित किया जाता है।

  5. आहरण अधिकारी का यह दायित्व है कि वह वेतन से नियमानुकूल की जाने वाली कटौतियों के सम्बन्ध में नियमित रूप से कटौती करे व कटौतियों का विवरण निर्धारित प्रपत्रों में अनुसूचियों को तैयार करवा कर उन्हें बिल के साथ संलग्न करवाए।

(घ)    आकस्मिक व्यय बिल -

  1. बिल निर्धारित प्रपत्र कोड-103 (संशोधित) में बनाया जाना चाहिए।

  2. वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के अध्याय-8 में दिये गये नियमों का पालन किया जाना चाहिए। व्यय की स्वीकृति नियमानुसार व्यय करने से पूर्व प्राप्त कर ली जानी चाहिए। यह देख लेना चाहिए कि वाउचर नियमानुसार बने हुये हैं।

  3. रू0 1,000/- से अधिक के मूल वाउचरों को बिल के साथ संलग्न किया जाना चाहिए। आहरण अधिकारियों का यह दायित्व है कि वह समस्त वाउचरों को सुरक्षित रखें व आडिट के समय प्रस्तुत करायें।

  4. समस्त वाउचरों में भुगतान आदेश अंको व शब्दों में लिखा जाना चाहिए तथा उसे अधिकृत अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।

  5. बिल में हस्ताक्षर करते समय सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि प्रत्येक सब वाउचर को इस प्रकार निरस्त कर दें कि पुन: आहरण न किया जा सके। यह सुनिश्चित करने के लिए  'भुगतान कर निरस्त किया' की मुहर लगाई जा सकती है।

  6. बिल को फार्म-13 में रखी पंजी (आकस्मिक व्यय पंजिका) में दर्ज करवाने के उपरान्त आहरण अधिकारी को बिल व पंजी में की गई प्रविष्टियों का मिलान कर लेना चाहिए।

  7. आहरण अधिकारी को व्यय करते समय मितव्ययिता व भुगतान की तुरन्त आवश्यकता होने पर ही आहरण विषयक सिद्धान्तों का कड़ाई से पालन करना चाहिए।

  8. धनराशि का भुगतान सही व्यक्ति/सही दावेदार को करने के उपरान्त उससे प्राप्त की गयी रसीद को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

  9. स्त्रोत पर आयकर एवं व्यापार कर की कटौती नियमानुसार की जानी चाहिए।

(ड़)    यात्रा भत्ता बिल

  1. यात्रा भत्ता बिलों के बारे में यह देखा जाना चाहिए कि बिल निर्धारित प्रपत्र कोड-102 (संशोधित) में प्रस्तुत किया गया है तथा उसमें दावेदार द्वारा आवश्यक प्रमाण-पत्र संलग्न करने के पश्चात हस्ताक्षर व तिथि का उल्लेख कर दिया गया है।

  2. यह देखा जाना चाहिए कि दावेदार द्वारा बिल समय के अन्दर प्रस्तुत कर दिया गया है। वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-74बी-5 के अनुसार यात्रा भत्ता दावा देय होने के एक वर्ष के अन्दर दावेदार द्वारा प्रस्तुत न किये जाने की दशा में उसका दावा समाप्त हो जाता है और ऐसे बिल को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

  3. यात्रा भत्ता बिलों को सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया जाना आवश्यक है।

  4. यदि कोई यात्रा भत्ता अग्रिम दिया गया हो तो उसका समायोजन उसी वित्तीय वर्ष में अवश्य सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए।

  5. यात्रा भत्ता बिलों को पारित करने तथा प्रतिहस्ताक्षरित करने के नियमों का पालन किया जाना चाहिए।

(च)    कोषागार से आहरण का समयबद्ध मिलान

                        आहरण वितरण सम्बन्धी आँकड़ों का मिलान कोषागार से तत्काल किया जाना चाहिए। बी0एम0-8 पर बजट नियंत्रक अधिकारी (विभागाध्यक्ष) को सूचना प्रेषित करने के पूर्व कोषागार से प्राप्त बी0एम0-9ए (मासिक रिकन्सिलिएशन स्टेटमेण्ट अथवा मिलान विवरण) से मासिक रूप से 11सी रजिस्टर एवं रोकड़ बही (कैश बुक) में की गयी प्रविष्टियों से उसका मिलान करके सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए कि कोई फर्जी/जाली भुगतान तो नहीं हुआ है। इस तरह मिलान कर सत्यता की पुष्टि कर लेनी चाहिए। विलम्ब से विवरण सत्यापित करने वाले आहरण एवं वितरण अधिकारी का वेतन शासनादेश संख्या: बी-2-2337/दस-97 के प्रस्तर 3ग के अनुपालन में रोका जा सकता है।

कालातीत चेक संबंधी प्रक्रिया

                वर्तमान समय में कोषागारों से समस्त भुगतान चेक के माध्यम से किए जाने की व्यवस्था है। चेकों की वैधता अवधि उसके निर्गत होने के माह के अलगे महीने के अन्तिम दिवस तक होती है। शासनादेश संख्या: ए-1-1199/दस-99-18(28)/72, दिनांक 21 अप्रैल 1999 के प्रस्तर-3 के अनुसार 31 मार्च तक के जारी किए गए चेकों को 30 अप्रैल के उपरान्त किसी भी दशा में रिवैलिडेट कर नए चेक जारी नहीं किए जाएगें। ऐसे कालातीत चेकों के सम्बन्ध में जिनके कारण शासन के विरूद्ध देनदारियाँ बनी रहती हैं उक्त शासनादेश द्वारा समस्या के समाधान हेतु निम्नलिखित कार्यवाही किए जाने की व्यवस्था की गई है -

  1. यदि सम्बन्धित मद में चालू वित्तीय वर्ष के आय-व्ययक में प्राविधान है तो ऐसी देनदारियों का भुगतान चालू वित्तीय वर्ष के आय-व्ययक से किया जाय।

  2. यदि सम्बन्धित मद में चालू वित्तीय  वर्ष के आय-व्ययक में प्राविधान नहीं है तो ऐसी देनदारियों का भुगतान चालू वित्तीय वर्ष के आय-व्ययक में प्राविधानित धनराशि के पुनर्विनियोग से किया जाय।

  3. यदि उपर्युक्त (1) व (2) से लम्बित देनदारियों का भुगतान सम्भव न हो तो अनुपूरक माँग के माध्यम से समुचित धनराशि की व्यवस्था कराकर भुगतान सुनिश्चित कराया जाय।

  4. कालातीत चेकों के निरस्तीकरण के संबंध में शासनादेश संख्या ए-1-1063/दस-89-10(28)/72 दिनांक 17 जून, 1989 के प्रस्तर- 10(3)(घ)(2) एवं 10 (3)(ड़) में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही सुनिश्चित की जाय।

  5. पेंशन, भविष्य निधि तथा अन्य लोक लेखा सम्बन्धित प्रकरणों में भी आहरण उसी प्रकार किया जाय, जैसा कि शासनादेश दिनांक 17 जून, 1989 में इंगित है। ऐसे प्रकरण में सिर्फ अन्तर यह होगा कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में अलग से बजट प्राविधान की धनराशि नहीं दर्शायी जायेगी।

  6. निरस्त चेक के एवज में नया चेक जारी किये जाने हेतु कोषागार से इस आशय का प्रमाण-पत्र भी प्राप्त करना होगा कि प्रश्नगत चेक निरस्त कर दिया गया है एवं कोषागार अभिलेखों से हटा दिया गया है, तत्पश्चात कोषागार में पूर्व पारित बिल की डुप्लीकेट बिल पुराना चेक संलग्न करते हुए प्रस्तुत करना होगा एवं बिल पर लाल स्याही से मोटे अक्षरों में निम्न आशय का प्रमाण पत्र दिया जाना होगा -

                प्रमाणित किया जाता है कि बिल संख्या ------------------------ दिनांक -------------------------- कुल धनराशि ----------------------------- के एवज में कोषागार द्वारा पारित चेक संख्या -------------------- दिनांक -------------------- धनराशि ------------------------- का भुगतान समय से प्राप्त न होने के कारण प्रश्नगत चेक कालातीत एवं निरस्त हो गया एवं इस वित्तीय वर्ष ------------------ में पुन: आहरण किया जा रहा है।

    7.    क्रय एवं सामग्री आपूर्ति के प्रकरणों में यह भी स्पष्ट प्रमाणित किया जाना आवश्यक होगा कि क्रय एवं आपूर्ति से सम्बन्धित समस्त औपचारिकतायें नियमानुसार पूर्ण हो चुकी है।

    8.    यह भी सुनिश्चित किया जाय कि कोषागारों द्वारा वित्तीय वर्ष (31 मार्च तक) में जारी किये गये चेकों के भुगतान, 30 अप्रैल, तक किन परिस्थितियों/कारणों से नहीं हो सके तथा इसके लिये कौन उत्तरदायी है, इसका उत्तरदायित्व निर्धारित कर दोषी सरकारी सेवक के विरूद्ध नियमानुसार कार्यवाही सुनिश्चित की जाय तथा इनमें से गम्भीर प्रकृति के मामले वित्त विभाग के संज्ञान में भी लाये जाये।

7.    सरकारी सेवकों के भविष्य निधि संबंधी एवं अन्य अभिलेखों का रख रखाव

(क)    समूह 'घ' के कर्मचारियों के सम्बन्ध में ब्राडशीट लेजर तथा पास बुकें रखी जानी होती हैं तथा इन अभिदाताओं से सम्बन्धित लेखे कार्यालयाध्यक्ष द्वारा रखे जाते हैं। परन्तु उसमें कटौतियों, अग्रिमों एवं ब्याज की प्रविष्टि आहरण-वितरण अधिकारी द्वारा ही की जाती है।

(ख)    तृतीय एवं उससे उच्च श्रेणी के सभी सरकारी सेवकों के लिए पास बुकों का रख-रखाव भी आहरण-वितरण अधिकारी द्वारा कराया जाता है। कर्मचारियों के लेजर तथा ब्राडशीट के रख-रखाव की प्रक्रिया शासनादेश संख्या: सा-4-ए0जी0-57/दस-84-510-84, दिनांक 26 दिसम्बर, 1984 में दिये गये निर्देशों के अनुसार की जानी चाहिए।   

(ग)    आहरण-वितरण  अधिकारी का दायित्व है कि कार्यालय के समस्त सरकारी सेवकों के वेतन से कटौती का अभिलेख रखें तथा उनकी अभिरक्षा सुनिश्चित करें। उचित  कटौतियों को करने व उनसे सम्बन्धित अनुसूचियों को विधिवत तैयार कर उनको बिलों के साथ संलग्न करने का दायित्व संवितरण अधिकारी का ही है।

(घ)    सेवा अभिलेखों के रख-रखाव विषयक नियम वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर- 142 तथा सहायक नियमों के अध्याय 10 में दिये गये हैं।

3.    पंजियों का रखरखाव

    (क)    रोकड़ बही (कैश बुक) : फार्म-2 में रखी जानी होती है। जिन कार्यालयों में दैनिक लेन-देनों की संख्या अधिक होती है वहाँ रोकड़ बही फार्म-2ए में रखी जाती है। कैश बुक को भरने से सम्बन्धित अनुदेश कैश बुक के मुख पृष्ठ पर ही छपे रहते हैं। उनका कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। एक कार्यालय में समस्त लेन-देन हेतु एक ही कैश बुक रखी जानी चाहिए।

    (ख)    वेतन बिलों की पंजी उस दशा में रखी जाती है जब कार्यालय प्रति के रूप में वेतन बिलों की प्रतियाँ रखने की प्रक्रिया सुविधाजनक न हो जिसमें अंकित प्रत्येक बिल के सम्मुख वाउचर नम्बर व तिथि अंकित करनी होती है। वर्तमान समय में सभी वेतन बिल चूँकि कम्प्यूटर से तैयार किए जाते हैं अत: उनकी प्रतियाँ ही रखी जाएगी।

    (ग)    जिन कार्यालयों में वेतन पंजियाँ रखी जाती हैं वहाँ वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-138 के अनुसार एक्वैटेन्स रोल का रख-रखाव किया जाता है।

    (घ)    आकस्मिक व्यय की पंजी: यह पंजी प्रपत्र -13 में रखी जाती है जिनके रख-रखाव के सम्बन्ध में उपरिलिखित नियम संग्रह के प्रस्तर 173 में नियम दिये गये है।

    (ड़)    यात्रा भत्ता बिलों की पंजी: यह पंजी वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-119 में दिये गये प्रारूप में रखी जाती है।                                                  

    (च)    बिल रजिस्टर : यह रजिस्टर फार्म 11-सी में रखा जाता है जिसके रख-रखाव विषयक नियम उपरिलिखित नियम संग्रह के प्रस्तर-139 में दिये गये हैं।

    (छ)    बिलों को कोषागार भेजने का रजिस्टर : बिलों को खोने अथवा गलत व्यक्ति के हाथ न पड़ने के उद्देश्य से यह पंजी रखी जाती है। इसमें बिलों की प्राप्ति कोषागार कर्मचारी द्वारा स्वीकार की जाती है। बिल वापस आने पर प्राप्त करने वाले कार्यालय कर्मचारी द्वारा तिथि अंकित कर हस्ताक्षर किये जाने होते हैं।

    (ज)    बिल भुगतान रजिस्टर : यह रजिस्टर उपरोक्त संग्रह के प्रस्तर-47ए में दिये गये प्रारूप में रखा जाता है।

    (झ)    बजट मैनुअल में फार्म बी0एम0-8 पर प्लान और नान-प्लान व्ययों के लिए अलग-अलग पंजियाँ रखी जाती है। इस पंजी के रख-रखाव  से सम्बन्धित नियम बजट मैनुअल के प्रस्तर 112, 116 एवं 118 में दिये गये हैं। यदि एक ही पंजी रखी गई हो तो उसमें प्लान और नान-प्लान व्यय के लिए अलग-अलग पृष्ठ निर्धारित किये जाने चाहिए। मासिक व्यय विवरण निकालने के पश्चात् इसकी एक प्रति आगामी माह की 5 तारीख तक बजट नियंत्रण अधिकारी को भेजी जानी होती है।

    ()    स्टाक बुक :   एम0जी0ओ0 के प्रस्तर-572 के अनुसार डेड स्टाक व लाइव स्टाक और कंज्यूमेबिल स्टोर के लिए अलग-अलग पंजियाँ रखी जानी होती हैं। क्रय की गई वस्तुओं के प्राप्त होने पर पहले इन्हें सम्बन्धित पंजी में अंकित कर लिया जाता है। हर प्रकार की वस्तु के लिए अलग-अलग पृष्ठ में अंकन किया जाना चाहिए। कार्यालयाध्यक्ष द्वारा कंज्यूमेबिल वस्तुओं का निरीक्षण 6 माह में एक बार व डेड व लाईव स्टाक के संबंधित वस्तुओं का निरीक्षण व भौतिक सत्यापन वर्ष में एक बार किया जाना चाहिए।

9.    कैशियर की जमानत

(क)    नकद लेन-देन करने वाले कर्मचारी व स्टोर  के प्रभारी कर्मचारी से कार्यभार ग्रहण करने के पूर्व नियमों द्वारा निर्धारित जमानत की धनराशि जमा करवा लें तथा सुनिश्चित करें कि धन का गबन व सरकारी वस्तुओं का दुरूपयोग न होने पाये।

(ख)    वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर- 69 से 73 में दी गई व्यवस्था के अनुसार आहरण एवं वितरण अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह अपने कार्यालय से सम्बन्धित नकदी एवं भण्डार आदि का कार्य करने वाले कर्मचारी से उक्त हस्त पुस्तिका में दिये गये प्रपत्र संख्या : 2ए, 2बी, 2सी, 2डी अथवा 2ई में से आवश्यक प्रपत्र पर सिक्योरिटी बाण्ड का निष्पादन भी करा लें और निष्पादित बाण्ड को सुरक्षित रखवा दें।

10.    वित्तीय अधिकार

जो आहरण-वितरण अधिकारी कार्यालयाध्यक्ष भी है -

(क)    वे वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-249(ए), 249(वाई), 249(आई) या 312(वी) के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के अग्रिम जैसे वेतन व यात्रा अग्रिम, अवकाश वेतन अग्रिम, एक माह में प्रयोग होने वाले मूल्य या रू0 25,000/- इनमें जो भी कम हो, पेट्रोल के खरीद के लिए अग्रिम व निर्माण कार्य के लिए रू0 2,000/- का एक बार में अग्रिम भी स्वीकृत कर सकते हैं।

(ख)    कार्यालय से सम्बन्धित समस्त शासकीय कार्य वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के परिशिष्ट-18 में दिये गये भण्डार क्रय नियमों के अनुसार किया जाना चाहिए।

(ग)    भण्डार सम्बन्धी लेखे एवं भण्डार की प्राप्ति एवं निर्गमन इत्यादि के सन्दर्भ में एम0जी0ओ0 के पैरा 572 में दिये गये नियम एवं उनसे सम्बन्धित परिशिष्ट 17 में निर्धारित प्रक्रियाओं का अनुपालन किया जाना चाहिए। भण्डार सम्बन्धी लेखों का रखरखाव वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-255 से 260 में दी गयी प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए।

(घ)    शासकीय भण्डार में किसी प्रकार की क्षति होने की दशा में उपर्युक्त वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के परिशिष्ट-19 बी में दिये गये नियमों एवं दिशा निर्देशों का अनुपालन किया जाना चाहिए। निष्प्रयोज्य एवं फालतू भण्डार के निस्तारण की प्रक्रिया एवं नियम उक्त नियमावली के परिशिष्ट 19 डी में दिये गये हैं।

(ड़)    वित्तीय नियम संग्रह खण्ड-पाँच भाग-1 के प्रस्तर-82 के अनुसार शासकीय धन अथवा सम्पत्ति की हानि होने की दशा में विभागाध्यक्ष, प्रशासनिक विभाग एवं महालेखाकार को अवश्य सूचित किया जाना चाहिए। उक्त सन्दर्भ में आवश्यक धनराशि का पुनराहरण आवश्यक होने की दशा में सक्षम अधिकारी की स्वीकृति लेने के पश्चात ही किया जाना चाहिए।

11.    समूह "घ" के कर्मचारियों के सामान्य भविष्य निधि खातों से विशेष कारण से अग्रिम तथा आंशिक अंतिम प्रत्याहरण

                विशेष कारणों से अग्रिम तथा आंशिक प्रत्याहरण की स्वीकृति हेतु प्रकरण विभागाध्यक्ष को भेजे जाने से इनके निस्तारण में होने वाले अत्यधिक विलम्ब तथा सामान्य भविष्य निधि खातों के रख-रखाव में कमियाँ रहने के फलस्वरूप त्रुटिपूर्ण भुगतान स्वीकृत होने की सम्भावना को दृष्टिगत रखते हुए एवं विलम्ब को दूर करने के उद्देश्य से विभागाध्यक्ष के कार्यालयों से भिन्न कार्यालयों के समूह-"घ" के कर्मचारियों के सामान्य भविष्य निधि खातों से विशेष कारणों से अग्रिम तथा आंशिक अंतिम  प्रत्याहरण की स्वीकृति के अधिकार संबंधित विभाग के जनपद-स्तर पर तैनात वरिष्ठतम आहरण एवं वितरण अधिकारियों को प्रतिनिधानित किए जाने की स्वीकृति शासनादेश संख्या-जी-2-67/दस-2007-318/2006, दिनांक 24 जनवरी, 2007 द्वारा प्रदान कर दी गयी हैं।

            अत: उक्त व्यवस्था के क्रम में संबंधित आहरण एवं वितरण अधिकारी अपने अधिकारों का प्रयोग करते समय कार्यालयाध्यक्षों द्वारा सामान्य भविष्य निधि के खातों के समुचित रख-रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित करवायेंगे तथा इस प्रयोजनार्थ समय-समय पर इनसे संबंधित लेखों का निरीक्षण भी करेंगे।

12.    सूचना संकलन तथा प्रेषण

                    संवितरण अधिकारी द्वारा प्रत्येक कार्यालय जिसका वह संवितरण अधिकारी है से सम्बन्धित मासिक व्यय की मानक मदवार सूचना प्रपत्र-बी0एम0-8 पर अनुवर्ती माह के प्रथम सप्ताह में विभागाध्यक्ष को नियमित रूप से प्रस्तुत की जानी चाहिए। इसके साथ ही साथ अधिकारियों/कर्मचारियों के वेतन से भवन अग्रिम, भवन विस्तार अग्रिम, वाहन अग्रिम तथा कम्प्यूटर अग्रिम आदि के विरूद्ध मूलधन अथवा ब्याज की वसूलियों का विवरण 'ऋणों एवं अग्रिम की वसूली' से सम्बन्धित प्रपत्र-क रजिस्टर में नियमित रूप से दर्ज किया जाना चाहिए। यह पंजिका प्रत्येक प्रकार के अग्रिम के लिये अलग-अलग संधारित की जानी चाहिए। इस पंजिका के आधार पर अग्रिमों के श्रेणीवार तैयार किये गये विवरण प्रपत्र-ख प्रत्येक माह बी0एम0-8 के साथ विभागाध्यक्ष को प्रेषित किया जाना चाहिए। यद्यपि उपर्युक्त शासनादेश के द्वारा यह अपेक्षित है कि आहरण एवं वितरण अधिकारी के स्तर पर केवल अल्पावधि अग्रिमों (Short term advances) अर्थात ऐसे अग्रिम, जिनकी वसूली 60 से कम किस्तों में की जानी अपेक्षित हो, का विस्तृत लेखा संधारित किया जाय परन्तु वित्तीय प्रबन्ध तथा विद्यमान परिस्थितियों की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए यह आवश्यक है कि संवितरण अधिकारी द्वारा समस्त प्रकार के अग्रिमों का विस्तृत लेखा अपने स्तर पर संधारित‍ किया जाय। यह देखते हुए कि अधिकारियों एवं कर्मचारियों को स्वीकृत दीर्घावधिक अग्रिम तथा उससे सम्बन्धित ब्याज की वसूली के विषय में महालेखाकार के साथ ही साथ आहरण-वितरण अधिकारियों के स्तर पर भी प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है, शासनादेश संख्या-ए-1-1291/दस-10(28)-78, दिनांक 30 सितम्बर, 1978 द्वारा वसूली के लिये शिड्यूल का प्रपत्र निर्धारित किया गया था और यह भी अपेक्षा की गयी थी कि यदि किसी अधिकारी का स्थानान्तरण होता है तो उसके विषय में जो भी अग्रिम अथवा उस पर देय ब्याज शेष चल रहे हों उनका पूरा विवरण भावी संवितरण अधिकारी को उपलब्ध करा दिया जाय। अग्रिमों की वसूली के विषय में समस्त संवितरण अधिकारियों से शासन के उपर्युक्त निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।

13.    आयकर एवं व्यापार कर - स्त्रोत पर कटौती

        (क)    आयकर

                  वर्तमान समय में आयकर से सम्बन्धित निम्नवत नियम व अधिनियम प्रभावी हैं :-

  1. आयकर अधिनियम, 1961

  2. आयकर नियमावली, 1962

  3. प्रत्येक वर्ष संसद द्वारा पारित वित्त अधिनियम

                         01 अप्रैल, 2005 से त्रैमासिक विवरण प्रेषित करना अनिवार्य कर दिया गया है। प्रत्येक वित्तीय वर्ष की 30 जून, 30 सितम्बर, 31 दिसम्बर एवं 31 मार्च का त्रैमासिक विवरण क्रमश: उसी वित्तीय वर्ष की 15 जुलाई, 15 अक्टूबर, 15 जनवरी तथा अन्तिम त्रैमास का वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात 15 जून तक आयकर विभाग को अनिवार्यत: प्रेषित कर दिया जाना चाहिए। इन त्रैमासिक विवरणियों में अधिष्ठान का Tax Deduction Account Number (TAN) तथा करदाता कर्मचारियों के Permanent Account Number (PAN) का अंकन अनिवार्य है। जानबूझ कर त्रुटिपूर्ण PAN सूचित करने पर आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 272-बी के अन्तर्गत रू0 10000 के अर्थदण्ड का प्राविधान है।

        (ख)    व्यापार कर-

U.P.T.T. Act, 1948 के Section 8-D के अन्तर्गत कर्म संविदा (Work. contract) के भुगतानों की दशा में किसी ठेकेदार से 4 प्रतिशत की दर से व्यापार कर की कटौती की जानी होती है। 

U.P.T.T. Act, 1948 के Section 2(M) में परिभाषित कर्म संविदा (Work. contract) का आशय निम्नलिखित है:-

Work contract includes any agreement for carrying out for cash deferred payment of other valuable consideration, the building construction, manufacture processing, fabrication, erection, installation, fitting out, improvement, modification repair or commissioning of any movable or immovable property.

उक्त धारा के अन्तर्गत U.P.T.T. Act, 1984 की धारा 3-F एवं Rule 44(A)(B)(C) भी इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है।

(व्यापार कर सम्बन्धी विस्तृत विवरण हेतु व्यापार कर विभाग के अधिनियम एवं नियम अवश्य देखें)।

संलग्नक-1

    Registers to be maintained at the level of Drawing and Disbursing Officer

  1. Check register of pay and allowance of class I officer where pay is drawn on establishment bills.

  2. Check register of pay and allowance of class II officers.

  3. Pay bill register.

  4. T.A. Check register for Gazetted Officers.

  5. T.A. Check register for Non Gazetted Staff.

  6. Register of Payees stamped receipt sent to accountant General.

  7. Register of  Contingent charges.

  8. Acquittance Roll for the disbursement of pay and T.A.

  9. Register of bills for presentation on the treasury.

  10. Register of bills sent for encashment.

  11. Bill Register in form II (c).

  12. Cash Book (Para 27A. F.H.B. Vol. V part I).

  13. Register in form B. M. 8 to have  a control on expenditure.

  14. Register of monthly deduction of security instalments. Form No. 2H.

  15. Register of Securities-Form  No. 2G.

  16. Ledger in form H.

  17. Register of recoveries of loans & advances from G.P.F.A/C Class IV.

  18. Broad Sheet in form H.

  19. Index Register.

  20. Ledger (G4-1077X50377 dated 8-5-78) of G.P.F. Class III & II and those Class I Officers Whose pay is drawn on establishment bills.

  21. Pass book of G.P.F. Class III & II and those Class I Officers Whose pay is drawn on establishment bills.

  22. Register of monthly deductions of Group Insurance Scheme, Pension Sanction and payment of interim pension & gratuity.

  23. Pension Control Register.

  24. Sanction & drawal register of Provisional pension and retirement or Death Gratuity.

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